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तेरा चेहरा

तेरा चेहरा पता नहीं क्यूँ ? तेरा चेहरा पता नहीं , सच में क्यूँ ? हर पल रहता है मेरे ख्यालों में , पता नहीं सच में क्यूँ ? जब में कुछ नहीं करता हूँ , तो समझो सोचता रहता हूँ , तेरे बारे में , पता नहीं क्यूँ ? और जब मैं सोचता हूँ की क्या सोचता हूँ तेरे बारे में तो पता नहीं चलता क्या सोचता हूँ तेरे बारे में । सच में अगर कोई पूछ ले कैसी दिखती हो ? पता नहीं मुझे । क्यूँ इतनी अच्छी लगती हो , ऐसा क्या है तुममें , मैं कभी नहीं बता पाऊँगा । ये भी नहीं पता की तुम वही हो जो मैं सोचता हूँ , या नहीं ? पर जानना भी नहीं चाहता । बस ये पता है की क्यूँ नहीं जानना चाहता ? शायद मुझे डर लगता है , किस बात का , ये नहीं पता ।

From a *letter*

I am writing a poem from a letter I wrote to someone, few days before, though I couldn't give this letter yet, I want to give it, someday! गिरता गिरता गिर ही गया उठने की कोशिश की तो फिर गिर गया, दरवाजे तक तो पहुँच गया पर भीतर जाने को न हुआ। उठता उठता फिर गिर गया सोचता रहा औरों ने मुझे गिराया है, पता चला मैं तो खुद ही गिर गया। शीशे मैं देखा तो दंग रह गया, न मैं था न मेरा प्रतिबिम्ब था, अपनी नज़रों से भी गिर गया था मैं शीशे मैं देखा न मैं था न मेरा प्रतिबिम्ब था। रोज रोज वही कहानी दोहराता गया सुबह को प्रण लेता, रात होते होते भूल जाता गया। अपनी नाकामी का इलजाम औरों पे लगाता गया, पता चला अपना गुनाहगार तो खुद हूँ मैं। इतना गिरा हूँ की गड्डे में भी आबाद हूँ शर्म और हया से अनजान हूँ मैं, मौत भी मुझे गले न लगायेगी इसीलिए शायद जिंदा हूँ मैं